rediff ILAND
Welcome Guest, | Create your own iLand| Sign In  | New User? Get Started
Home
iLand
Blogs
Friends/Contributors
Guestbook  
 
Goldy
Categories
Fantasy
Cricket
Personal
Philosophy
BUS UHI
DOSTI
NARI
betiyan
MUKTI
HUM LOG
Time Pass
DIL
Poetry
My Top Posts
AAJ KI NARI ...
तु&#...
मु&#...
Favourites 1
harsh tripathi
What is an RSS feed?
RSS Feed 
ranchieye.rediffiland.com/ 
Recent Posts
 18:46 | 24/Nov/2007 | 25 Comment(s)

वो बे इंतहा शक्श आज जु दा सा है


जाने क्यूँ मुझसे थोड़ा खफा सा है

उसकी बेरूख़ी बेमानी है या रब

मेरा गुस्सा तो पानी का बुलबुला सा है

उसकी सारी बातें दिलमे दबी-दबी

थोड़ा दर्द ऑर थोड़ा दवा सा है

मै तो वाकिफ़ नही थी दुनिया के इस चलन से

मेरा तजुर्बा तो श्मशान की हवा सा है

क्या ख्ता हुई जो थोड़ा कुछ कहा हमने

तेरे दो लफ़्ज दो पल में बेगाना कर गये मुझे

अतीत मे हूँ सारा जख्म हरा सा है

फिर भी मुझे मलाल नहीँ तेरे रंजो गम से है

तुझे माना है मैने इतना की तू खुदा सा है

वो बे इंतहा अजीज शक्श आज जु दा सा है


Permalink 
 09:12 | 12/Nov/2007 | 18 Comment(s)
hasrat

हसरत

 हसरत ही रही हमारी
की हम रूठे ऑर वो मनाए
चाहते रहे हरदम
की वो सोए ऑर हम जगाएँ
पर आफ़सोस!
मेरे रूठने से पहले
रूठ जाते हैं वो
ऑर जागने से पहले
चले जाते हैं वो
सोचते रहे दिनभरकी वो आएँ तो गुस्सा दिखाएँ
पर आफ़सोस!
वो तो आए हीं नही
हसरत ही रही हमारी की हम रूठे ऑर वो मनाएँ
मेरे सुबकने के पहले फुट पड़े वो
मुस्कुराएँ इससे पहले चहक पड़े वो
मानते रहे उमर भर की वो भटके
ऑर हम रास्ता दिखाएँ
पर आफ़सोस !
की वो कभी अकेले चले हीं नही
हसरत ही रही हमरी की हम रूठे ऑर वो मनाएँ
हसरत ही रही .....हसरत ही रही.....

Permalink 
 18:31 | 3/Nov/2007 | 8 Comment(s)

क्या कल फिर आओगे सूरज ?

आज मैने सूरज को बदली मे छूपते देखा /
आज मैने सूरज को बदली से झाँकते देखा /
वह लुक-छिप कर आगे बढ़ रहा था /
मैने सूरज से कहा / यहीं रुक जा
कहाँ मारा फिरता है / गिरता है , उठता है
मेरी नही सुनता है / पिछे नही मुड़ता है
मै फिर कहती हूँ / रुक जा
आगे क्यूँ बढ़ता है / यहाँ सब मिथ्या है
जरा सोंच / कहीं सुबह कहीं शाम
कहीं रहीम कहीं राम / कहीं यीशू , कहीं नानक
कहीं रक्षक कहीं भक्षक / अरे पगले
यही सृष्टि का जाल है / यहाँ मत फसो
वरना ऐसे हीं फिरता रहेगा मारा - मारा /
रोज तुझे उदित ऑर अस्त होना पड़ेगा |

Permalink 
 12:13 | 20/Oct/2007 | 13 Comment(s)

हम ऑर तुम

दो

 अजनबी की तरह मिले हम,
ध्वनियाँ
आहटें
कुछ-कुछ जानी पहचानी सी,
कोने -अंतरे
नाक पलक
मोन-अंतस
आनचाही चुप्पियाँ
दो अजनबी भाषाओं की तरह मिले हम
चकित
अलग-अलग
ग्रहों के अपरिचित
दोनो ही
दोनो किरदारो मे एक साथ
अविष्कार ऑर
अविष्करित्त
महक अबूझ छुआन अकथ
फिर समान संकेतों की
तहें खोलता हुआ
तलाश की बेचैनी के साथ


हाँ....हाँ !!!!!!!


प्यार आया
हमारे बीच
अनुवाद की तरह
दो अजनबी
भाषाओं की तरह मिले थे हम......

Permalink 
 13:55 | 14/Oct/2007 | 16 Comment(s)

आँखें

मै नही कहूँगी की तुम्हारी आँखें झील सी गहरी हैं,

तारीफ़ के शब्द एक भी इस्तेमाल ंही करूंगी,
तुम्हारी आँखों के लिए,

ऑर तो ऑर ना कोई
कहानी लिखूँगी , ना कविता , ना ग़ज़ल

ये भी नहीं कहूँगी की तलबगार हूँ मै
तुम्हारी इन आँखो की,
लेकिन ये मत पूछना की ऐसा क्यों,
मै भी नही जानती

आख़िर क्यों मै कतराती हूँ इन बातों से,
ऐसी बातों से..........


Permalink 
 09:19 | 13/Oct/2007 | 13 Comment(s)

 

माँ

माँ तुम क्या हो / एक यात्रा की गंतव्य / यात्रीक की साधना संबल / अथवा पथेय / तुम्हारी साधना केपार्श्व मे / स्वार्थ है भर्म है /
तुउम निर्माता नियामक कही जाती हो / तुम्हारा अस्तित्व आसंदिग्ध है / फिर भी सभी दिग्भ्रंत क्यों है / कभी चमत्कार मे व्यक्त होती हो / ह्ताशा के छनो मे / दीपषिखा सी दिखती हो /
निराशा के छनो मेआवलंबन हो / क्या यह भी मनुष्य की स्वार्थ परकता है / अथवा एक प्राकृतक सत्य है / सर्वार्ध सुंदर हो , वैभ्व
मंदित हो / फिर भी इतनी विदरुपताएँ क्यों ?

नवरात्रि की ढेरों शुभकामनाएँ

Permalink 
 14:05 | 11/Oct/2007 | 11 Comment(s)

तुम्हारा ख़त
तुम्हारा ख़त

धूप के रेशमी टूकड़े सा

सरक कर आता है

मेरे हृदय की दहलीज तक

जीवन के हर गलियारे को

भर देता है
एक उस्मिय आभास से
शिथिल हो चली कमनाओं को
ताज़ा कर देता है
जादुई अहसास से
दोनो हाथों से
सामेट्ते हुए तुम्हारा प्यार
मैं करती हूँ
फिर नये ख़त का इंतेज़ार

Permalink 
 13:46 | 2/Oct/2007 | 10 Comment(s)

 

दिल की आवाज़ दिल तक पहूचनें तो दो,

शबनमी हँसी होटो पर बिखरने तो दो,

ज़माने भर की बातों का बदला ना लो ख़ुद से,

मर्ज़ी से इसे एक बार धरकने तो दो,

पलकों को मिल जाने दो,दिल की आवाज़ दिल तक पहूचने तो दो,

धरकने तमन्नाएँ बुन्ति हैं,

उसे हक़ीकत की तह तक जाने तो दो !

Permalink 
 22:07 | 1/Oct/2007 | 11 Comment(s)

 हमलोग


ख़ुद से रूठे हैं हमलोग , टूटे - फूटे हैं हमलोग ,

सत्य चुराता नज़रें हमसे , इतने झूठे हैं हमलोग ,

इसे साध लें , उसे बाँध लें , सचमुच खुटे हैं हमलोग ,

क्या कर लेंगी वे तलवारें , जिनकी मुटे हैं हम लोग,

मायख़वरों की हर महफ़िल मे , ख़ाली घूटें हैं हमलोग ,

हमें अजयाब घर में रख दो , बहुत अनूठे हैं हमलोग,

हस्ताक्षर तो बन ना सकेंगे , सिर्फ़ अंगूठे हैं हमलोग |

Permalink 
 08:23 | 18/Sep/2007 | 13 Comment(s)

मुक्ति की चाह

खुले आकाश की चाह
आज भी सुमीत्रा नंदन पंत जी की यह पंक्तियाँ सर्व कालीन नारियों पर समरूप से प्रयोज्य हैं
"अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आँचल में है दूध और आँखों में पानी"
अपने भावी जीवन के बारे में आत्मनिर्णय का अधिकार लड़की को क्यों नहीं मिलता ?
शादी के पूर्व माता- पिता और शादी के बाद ससुराल वालों पर क्यों निर्भर करती है ?
पत्नी के लिए पति एक "सच्चे जीवन साथी" की जगह "पति परमेश्वर या पति देव "क्यों माना जाता है ?
वैद्य और अवैद्य संतान क्या है ?
क्या मा की अपनी संतान को जन्म देना वैद्यता के लिए काफ़ी नहीं है ?
औरतों के पक्ष में होने वाले क़ानूनो के लाभ से औरतें क्यों वंचित रह जाती हैं ?
विधवा युवतियाँ आजीवन अभिशाप झेलती रहती हैं पर विदूर पुरुष को कई -कई शादियाँ करने की छूट क्यों मिलती है ?
विश्व भर में नारियों पर इतने शर्मनाक, अमानुशिक, आतंक़्पुर्ण, अत्याचार होते हैं की सोचना पड़ता है की आदमी औरत से प्याऱ ज़्यादा करता है या नफ़रत ?
कलियुग से सत्यूग तक सीता से द्रौप्दि तक और वॉल्गा से गंगा तक नारी की वही कहानी क्यों है ?
स्त्री सत्तात्मक समाज पुरुष सत्तात्मक समाज में कैसे तब्दील हो गया ?


Permalink