वो बे इंतहा शक्श आज जु दा सा है
जाने क्यूँ मुझसे थोड़ा खफा सा है
उसकी बेरूख़ी बेमानी है या रब
मेरा गुस्सा तो पानी का बुलबुला सा है
उसकी सारी बातें दिलमे दबी-दबी
थोड़ा दर्द ऑर थोड़ा दवा सा है
मै तो वाकिफ़ नही थी दुनिया के इस चलन से
मेरा तजुर्बा तो श्मशान की हवा सा है
क्या ख्ता हुई जो थोड़ा कुछ कहा हमने
तेरे दो लफ़्ज दो पल में बेगाना कर गये मुझे
अतीत मे हूँ सारा जख्म हरा सा है
फिर भी मुझे मलाल नहीँ तेरे रंजो गम से है
तुझे माना है मैने इतना की तू खुदा सा है
वो बे इंतहा अजीज शक्श आज जु दा सा है