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क्या कल फिर आओगे सूरज ? आज मैने सूरज को बदली मे छूपते देखा / आज मैने सूरज को बदली से झाँकते देखा / वह लुक-छिप कर आगे बढ़ रहा था / मैने सूरज से कहा / यहीं रुक जा कहाँ मारा फिरता है / गिरता है , उठता है मेरी नही सुनता है / पिछे नही मुड़ता है मै फिर कहती हूँ / रुक जा आगे क्यूँ बढ़ता है / यहाँ सब मिथ्या है जरा सोंच / कहीं सुबह कहीं शाम कहीं रहीम कहीं राम / कहीं यीशू , कहीं नानक कहीं रक्षक कहीं भक्षक / अरे पगले यही सृष्टि का जाल है / यहाँ मत फसो वरना ऐसे हीं फिरता रहेगा मारा - मारा / रोज तुझे उदित ऑर अस्त होना पड़ेगा |
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