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आँखें मै नही कहूँगी की तुम्हारी आँखें झील सी गहरी हैं,
तारीफ़ के शब्द एक भी इस्तेमाल ंही करूंगी, तुम्हारी आँखों के लिए,
ऑर तो ऑर ना कोई कहानी लिखूँगी , ना कविता , ना ग़ज़ल
ये भी नहीं कहूँगी की तलबगार हूँ मै तुम्हारी इन आँखो की, लेकिन ये मत पूछना की ऐसा क्यों, मै भी नही जानती
आख़िर क्यों मै कतराती हूँ इन बातों से, ऐसी बातों से..........
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