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माँ माँ तुम क्या हो / एक यात्रा की गंतव्य / यात्रीक की साधना संबल / अथवा पथेय / तुम्हारी साधना केपार्श्व मे / स्वार्थ है भर्म है / तुउम निर्माता नियामक कही जाती हो / तुम्हारा अस्तित्व आसंदिग्ध है / फिर भी सभी दिग्भ्रंत क्यों है / कभी चमत्कार मे व्यक्त होती हो / ह्ताशा के छनो मे / दीपषिखा सी दिखती हो / निराशा के छनो मेआवलंबन हो / क्या यह भी मनुष्य की स्वार्थ परकता है / अथवा एक प्राकृतक सत्य है / सर्वार्ध सुंदर हो , वैभ्व मंदित हो / फिर भी इतनी विदरुपताएँ क्यों ?
नवरात्रि की ढेरों शुभकामनाएँ
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