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हमलोग ख़ुद से रूठे हैं हमलोग , टूटे - फूटे हैं हमलोग ,
सत्य चुराता नज़रें हमसे , इतने झूठे हैं हमलोग ,
इसे साध लें , उसे बाँध लें , सचमुच खुटे हैं हमलोग ,
क्या कर लेंगी वे तलवारें , जिनकी मुटे हैं हम लोग,
मायख़वरों की हर महफ़िल मे , ख़ाली घूटें हैं हमलोग ,
हमें अजयाब घर में रख दो , बहुत अनूठे हैं हमलोग,
हस्ताक्षर तो बन ना सकेंगे , सिर्फ़ अंगूठे हैं हमलोग |
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