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मुक्ति की चाह खुले आकाश की चाह आज भी सुमीत्रा नंदन पंत जी की यह पंक्तियाँ सर्व कालीन नारियों पर समरूप से प्रयोज्य हैं "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आँचल में है दूध और आँखों में पानी" अपने भावी जीवन के बारे में आत्मनिर्णय का अधिकार लड़की को क्यों नहीं मिलता ? शादी के पूर्व माता- पिता और शादी के बाद ससुराल वालों पर क्यों निर्भर करती है ? पत्नी के लिए पति एक "सच्चे जीवन साथी" की जगह "पति परमेश्वर या पति देव "क्यों माना जाता है ? वैद्य और अवैद्य संतान क्या है ? क्या मा की अपनी संतान को जन्म देना वैद्यता के लिए काफ़ी नहीं है ? औरतों के पक्ष में होने वाले क़ानूनो के लाभ से औरतें क्यों वंचित रह जाती हैं ? विधवा युवतियाँ आजीवन अभिशाप झेलती रहती हैं पर विदूर पुरुष को कई -कई शादियाँ करने की छूट क्यों मिलती है ? विश्व भर में नारियों पर इतने शर्मनाक, अमानुशिक, आतंक़्पुर्ण, अत्याचार होते हैं की सोचना पड़ता है की आदमी औरत से प्याऱ ज़्यादा करता है या नफ़रत ? कलियुग से सत्यूग तक सीता से द्रौप्दि तक और वॉल्गा से गंगा तक नारी की वही कहानी क्यों है ? स्त्री सत्तात्मक समाज पुरुष सत्तात्मक समाज में कैसे तब्दील हो गया ?
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